श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एवमध्यात्मयोगेन कर्माण्यनुसमाचरन्।

पुत्रानुत्पादयामास पंचार्चिष्यात्मसम्मतान्॥ ५३

evamadhyātmayogena karmāṇyanusamācaran|

putrānutpādayāmāsa paṃcārciṣyātmasammatān|| 53

अर्थ

इस प्रकार आत्मनिष्ठामें स्थित होकर सभी कर्तव्यकर्मोंका यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करते हुए उन्होंने अपनी भार्या अर्चिके गर्भसे अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ५३॥

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