श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

पृथुरुवाच

अहो आचरितं किं मे मंगलं मंगलायनाः।

यस्य वो दर्शनं ह्यासीद्दुर्दर्शानां च योगिभिः॥ ७

aho ācaritaṃ kiṃ me maṃgalaṃ maṃgalāyanāḥ|

yasya vo darśanaṃ hyāsīddurdarśānāṃ ca yogibhiḥ|| 7

अर्थ

पृथुजीने कहा—मंगलमूर्ति मुनीश्‍वरो! आपके दर्शन तो योगियोंको भी दुर्लभ हैं; मुझसे ऐसा क्या पुण्य बना है जिससे स्वतः आपका दर्शन प्राप्त हुआ॥ ७॥

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