श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन

मैत्रेय उवाच

दृष्ट्वाऽऽत्मानं प्रवयसमेकदा वैन्य आत्मवान्।

आत्मना वर्धिताशेषस्वानुसर्गः प्रजापतिः॥ १

dṛṣṭvā''tmānaṃ pravayasamekadā vainya ātmavān|

ātmanā vardhitāśeṣasvānusargaḥ prajāpatiḥ|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार महामनस्वी प्रजापति पृथुके स्वयमेव अन्‍नादि तथा पुर-ग्रामादि सर्गकी व्यवस्था करके स्थावर-जंगम सभीकी आजीविकाका सुभीता कर दिया तथा साधुजनोचित धर्मोंका भी खूब पालन किया। ‘मेरी अवस्था कुछ ढल गयी है और जिसके लिये मैंने इस लोकमें जन्म लिया था, उस प्रजारक्षणरूप ईश्‍वराज्ञाका पालन भी हो चुका है; अतः अब मुझे अन्तिम पुरुषार्थ—मोक्षके लिये प्रयत्न करना चाहिये’ यह सोचकर उन्होंने अपने विरहमें रोती हुई अपनी पुत्रीरूपा पृथ्वीका भार पुत्रोंको सौंप दिया और सारी प्रजाको बिलखती छोड़कर वे अपनी पत्नीसहित अकेले ही तपोवनको चल दिये॥ १—३॥

यह अर्थ श्लोक 1–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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