फिर सम्पूर्ण गुणोंकी अभिव्यक्ति करनेवाले उस महत्तत्त्वको मायोपाधिक जीवमें स्थित किया। तदनन्तर उस मायारूप जीवकी उपाधिको भी उन्होंने ज्ञान और वैराग्यके प्रभावसे अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूपमें स्थित होकर त्याग दिया॥ १८॥
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात्।
तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान्।
ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽजहात्प्रभुः॥ १८
फिर सम्पूर्ण गुणोंकी अभिव्यक्ति करनेवाले उस महत्तत्त्वको मायोपाधिक जीवमें स्थित किया। तदनन्तर उस मायारूप जीवकी उपाधिको भी उन्होंने ज्ञान और वैराग्यके प्रभावसे अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूपमें स्थित होकर त्याग दिया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 521) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/18/