जो राजा विजयके लिये प्रस्थान करते समय इसे सुनकर जाता है, उसके आगे आ-आकर राजालोग उसी प्रकार भेंटें रखते हैं जैसे पृथुके सामने रखते थे॥ ३६॥✎ 411
विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान्।
बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजानः पृथवे यथा॥ ३६
जो राजा विजयके लिये प्रस्थान करते समय इसे सुनकर जाता है, उसके आगे आ-आकर राजालोग उसी प्रकार भेंटें रखते हैं जैसे पृथुके सामने रखते थे॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 523) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में