श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यदुक्तं पथि दृष्टेन गिरिशेन प्रसीदता।

तद्ध्यायन्तो जपन्तश्‍च पूजयन्तश्‍च संयताः॥ १५

yaduktaṃ pathi dṛṣṭena giriśena prasīdatā|

taddhyāyanto japantaśca pūjayantaśca saṃyatāḥ|| 15

अर्थ

घरसे तपस्या करनेके लिये जाते समय मार्गमें श्रीमहादेवजीने उन्हें दर्शन देकर कृपापूर्वक जिस तत्त्वका उपदेश दिया था, उसीका वे एकाग्रतापूर्वक ध्यान, जप और पूजन करते रहे॥ १५॥✎ 1606

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1606 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नव-विवाहिता → नवविवाहिता

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