श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

पित्राऽऽदिष्टाः प्रजासर्गे तपसेऽर्णवमाविशन्।

दशवर्षसहस्राणि तपसाऽऽर्चंस्तपस्पतिम्॥ १४

pitrā''diṣṭāḥ prajāsarge tapase'rṇavamāviśan|

daśavarṣasahasrāṇi tapasā''rcaṃstapaspatim|| 14

अर्थ

जब पिताने उन्हें सन्तान उत्पन्‍न करनेका आदेश दिया, तब उन सबने तपस्या करनेके लिये समुद्रमें प्रवेश किया। वहाँ दस हजार वर्षतक तपस्या करते हुए उन्होंने तपका फल देनेवाले श्रीहरिकी आराधना की॥ १४॥✎ 1606

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1606 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नव-विवाहिता → नवविवाहिता

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