श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यः परं रंहसः साक्षात्त्रिगुणाज्जीवसंज्ञितात्।

भगवन्तं वासुदेवं प्रपन्‍नः स प्रियो हि मे॥ २८

yaḥ paraṃ raṃhasaḥ sākṣāttriguṇājjīvasaṃjñitāt|

bhagavantaṃ vāsudevaṃ prapannaḥ sa priyo hi me|| 28

अर्थ

जो व्यक्ति अव्यक्त प्रकृति तथा जीवसंज्ञक पुरुष—इन दोनोंके नियामक भगवान् वासुदेवकी साक्षात् शरण लेता है, वह मुझे परम प्रिय है॥ २८॥

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