॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.29
स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान्
विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम्।
पदं यथाहं विबुधाः कलात्यये॥ २९
svadharmaniṣṭhaḥ śatajanmabhiḥ pumān
viriñcatāmeti tataḥ paraṃ hi mām|
avyākṛtaṃ bhāgavato'tha vaiṣṇavaṃ
padaṃ yathāhaṃ vibudhāḥ kalātyaye|| 29
अर्थ
अपने वर्णाश्रमधर्मका भलीभाँति पालन करनेवाला पुरुष सौ जन्मके बाद ब्रह्माके पदको प्राप्त होता है और इससे भी अधिक पुण्य होनेपर वह मुझे प्राप्त होता है। परन्तु जो भगवान्का अनन्य भक्त है, वह तो मृत्युके बाद ही सीधे भगवान् विष्णुके उस सर्वप्रपंचातीत परमपदको प्राप्त हो जाता है, जिसे रुद्ररूपमें स्थित मैं तथा अन्य आधिकारिक देवता अपने-अपने अधिकारकी समाप्तिके बाद प्राप्त करेंगे॥ २९॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—अव्याहतं।
- २
प्रा० पा०—वतं सवैष्णवं।