नाथ! आप ही पुराणपुरुष तथा सांख्य और योगके अधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं; आप सब प्रकारकी कामनाओंकी पूर्तिके कारण, साक्षात् मन्त्रमूर्ति और महान् धर्मस्वरूप हैं; आपकी ज्ञानशक्ति किसी भी प्रकार कुण्ठित होनेवाली नहीं है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ४२॥✎ 13331334
नमस्त आशिषामीश मनवे कारणात्मने।
नमो धर्माय बृहते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।
पुरुषाय पुराणाय सांख्ययोगेश्वराय च॥ ४२
नाथ! आप ही पुराणपुरुष तथा सांख्य और योगके अधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं; आप सब प्रकारकी कामनाओंकी पूर्तिके कारण, साक्षात् मन्त्रमूर्ति और महान् धर्मस्वरूप हैं; आपकी ज्ञानशक्ति किसी भी प्रकार कुण्ठित होनेवाली नहीं है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 528) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
#1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी