श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

शक्तित्रयसमेताय मीढुषेऽहंकृतात्मने।

चेतआकूतिरूपाय नमो वाचोविभूतये॥ ४३

śaktitrayasametāya mīḍhuṣe'haṃkṛtātmane|

cetaākūtirūpāya namo vācovibhūtaye|| 43

अर्थ

आप ही कर्ता, करण और कर्म—तीनों शक्तियोंके एकमात्र आश्रय हैं; आप ही अहंकारके अधिष्ठाता रुद्र हैं; आप ही ज्ञान और क्रियास्वरूप हैं तथा आपसे ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—चार प्रकारकी वाणीकी अभिव्यक्ति होती है; आपको नमस्कार है॥ ४३॥✎ 1333 1334

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
  • #1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी

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