॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.45
स्निग्धप्रावृड्घनश्यामं सर्वसौन्दर्यसंग्रहम्।
चार्वायतचतुर्बाहुं सुजातरुचिराननम्॥ ४५
snigdhaprāvṛḍghanaśyāmaṃ sarvasaundaryasaṃgraham|
cārvāyatacaturbāhuṃ sujātarucirānanam|| 45
अर्थ
वह वर्षाकालीन मेघके समान स्निग्ध श्याम और सम्पूर्ण सौन्दर्योंका सार-सर्वस्व है। सुन्दर चार विशाल भुजाएँ, महामनोहर मुखारविन्द, कमलदलके समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, सुघड़ नासिका, मनमोहिनी दन्तपंक्ति, अमोल कपोलयुक्त मनोहर मुखमण्डल और शोभाशाली समान कर्ण-युगल हैं॥ ४५-४६॥