श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.46

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

पद्मकोशपलाशाक्षं सुन्दरभ्रु सुनासिकम्।

सुद्विजं सुकपोलास्यं समकर्णविभूषणम्॥ ४६

padmakośapalāśākṣaṃ sundarabhru sunāsikam|

sudvijaṃ sukapolāsyaṃ samakarṇavibhūṣaṇam|| 46

अर्थ

वह वर्षाकालीन मेघके समान स्निग्ध श्याम और सम्पूर्ण सौन्दर्योंका सार-सर्वस्व है। सुन्दर चार विशाल भुजाएँ, महामनोहर मुखारविन्द, कमलदलके समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, सुघड़ नासिका, मनमोहिनी दन्तपंक्ति, अमोल कपोलयुक्त मनोहर मुखमण्डल और शोभाशाली समान कर्ण-युगल हैं॥ ४५-४६॥

यह अर्थ श्लोक 45–46 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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