श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.54

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

भवान् भक्तिमता लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम्।

स्वाराज्यस्याप्यभिमत एकान्तेनात्मविद्गतिः॥ ५४

bhavān bhaktimatā labhyo durlabhaḥ sarvadehinām|

svārājyasyāpyabhimata ekāntenātmavidgatiḥ|| 54

अर्थ

स्वर्गका शासन करनेवाला इन्द्र भी आपको ही पाना चाहता है तथा विशुद्ध आत्मज्ञानियोंकी गति भी आप ही हैं। इस प्रकार आप सभी देहधारियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं; केवल भक्तिमान् पुरुष ही आपको पा सकते हैं॥ ५४॥✎ 414

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #414 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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