स्वर्गका शासन करनेवाला इन्द्र भी आपको ही पाना चाहता है तथा विशुद्ध आत्मज्ञानियोंकी गति भी आप ही हैं। इस प्रकार आप सभी देहधारियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं; केवल भक्तिमान् पुरुष ही आपको पा सकते हैं॥ ५४॥✎ 414
भवान् भक्तिमता लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम्।
स्वाराज्यस्याप्यभिमत एकान्तेनात्मविद्गतिः॥ ५४
स्वर्गका शासन करनेवाला इन्द्र भी आपको ही पाना चाहता है तथा विशुद्ध आत्मज्ञानियोंकी गति भी आप ही हैं। इस प्रकार आप सभी देहधारियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं; केवल भक्तिमान् पुरुष ही आपको पा सकते हैं॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 530) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)