सत्पुरुषोंके लिये भी दुर्लभ अनन्य भक्तिसे भगवान्को प्रसन्न करके, जिनकी प्रसन्नता किसी अन्य साधनासे दुःसाध्य है, ऐसा कौन होगा जो उनके चरणतलके अतिरिक्त और कुछ चाहेगा॥ ५५॥✎ 414
तं दुराराध्यमाराध्य सतामपि दुरापया।
एकान्तभक्त्या को वाञ्छेत्पादमूलं विना बहिः॥ ५५
सत्पुरुषोंके लिये भी दुर्लभ अनन्य भक्तिसे भगवान्को प्रसन्न करके, जिनकी प्रसन्नता किसी अन्य साधनासे दुःसाध्य है, ऐसा कौन होगा जो उनके चरणतलके अतिरिक्त और कुछ चाहेगा॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 530) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)