॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.64
सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविष्ट-
श्चतुर्विधं पुरमात्मांशकेन।
अथो विदुस्तं पुरुषं सन्तमन्त-
र्भुङ्क्ते हृषीकैर्मधु सारघं यः१॥ ६४
sṛṣṭaṃ svaśaktyedamanupraviṣṭa-
ścaturvidhaṃ puramātmāṃśakena|
atho vidustaṃ puruṣaṃ santamanta-
rbhuṅkte hṛṣīkairmadhu sāraghaṃ yaḥ|| 64
अर्थ
फिर आप अपनी ही मायाशक्तिसे रचे हुए इन जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्जभेदसे चार प्रकारके शरीरोंमें अंशरूपसे प्रवेश कर जाते हैं और जिस प्रकार मधुमक्खियाँ अपने ही उत्पन्न किये हुए मधुका आस्वादन करती हैं, उसी प्रकार वह आपका अंश उन शरीरोंमें रहकर इन्द्रियोंके द्वारा इन तुच्छ विषयोंको भोगता है। आपके उस अंशको ही पुरुष या जीव कहते हैं॥ ६४॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—सारघं पयः।