श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.65

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

स एष लोकानतिचण्डवेगो

विकर्षसि त्वं खलु कालयानः२।

भूतानि भूतैरनुमेयतत्त्वो

घनावलीर्वायुरिवाविषह्यः ॥ ६५

sa eṣa lokānaticaṇḍavego

vikarṣasi tvaṃ khalu kālayānaḥ|

bhūtāni bhūtairanumeyatattvo

ghanāvalīrvāyurivāviṣahyaḥ || 65

अर्थ

प्रभो! आपका तत्त्वज्ञान प्रत्यक्षसे नहीं अनुमानसे होता है। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर कालस्वरूप आप ही अपने प्रचण्ड एवं असह्य वेगसे पृथ्वी आदि भूतोंको अन्य भूतोंसे विचलित कराकर समस्त लोकोंका संहार कर देते हैं—जैसे वायु अपने असहनीय एवं प्रचण्ड झोंकोंसे मेघोंके द्वारा ही मेघोंको तितर-बितर करके नष्ट कर डालती है॥ ६५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कामयानः।

    (मुद्रित पृष्ठ 531)

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