श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.67

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितो

यस्तेऽवमानव्ययमानकेतनः ।

विशङ्कयास्मद‍्गुरुरर्चति स्म यद्

विनोपपत्तिं मनवश्‍चतुर्दश॥ ६७

kastvatpadābjaṃ vijahāti paṇḍito

yaste'vamānavyayamānaketanaḥ |

viśaṅkayāsmadgururarcati sma yad

vinopapattiṃ manavaścaturdaśa|| 67

अर्थ

आपकी अवहेलना करनेके कारण अपनी आयुको व्यर्थ माननेवाला ऐसा कौन विद्वान् होगा, जो आपके चरणकमलोंको बिसारेगा? इनकी पूजा तो कालकी आशंकासे ही हमारे पिता ब्रह्माजी और स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओंने भी बिना कोई विचार किये केवल श्रद्धासे ही की थी॥ ६७॥✎ 1974

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1974 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): इसकी → इनकी

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें