ब्रह्मन्! इस प्रकार सारा जगत् रुद्ररूप कालके भयसे व्याकुल है। अतः परमात्मन्! इस तत्त्वको जाननेवाले हमलोगोंके तो इस समय आप ही सर्वथा भयशून्य आश्रय हैं॥ ६८॥✎ 1974
अथ त्वमसि नो ब्रह्मन् परमात्मन् विपश्चिताम्।
विश्वं रुद्रभयध्वस्तमकुतश्चिद्भया गतिः॥ ६८
ब्रह्मन्! इस प्रकार सारा जगत् रुद्ररूप कालके भयसे व्याकुल है। अतः परमात्मन्! इस तत्त्वको जाननेवाले हमलोगोंके तो इस समय आप ही सर्वथा भयशून्य आश्रय हैं॥ ६८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.68 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 532) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/68/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1974 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): इसकी → इनकी