राजकुमारो! तुमलोग विशुद्धभावसे स्वधर्मका आचरण करते हुए भगवान्में चित्त लगाकर मेरे कहे हुए इस स्तोत्रका जप करते रहो; भगवान् तुम्हारा मंगल करेंगे॥ ६९॥✎ 4151335
इदं जपत भद्रं वो विशुद्धा नृपनन्दनाः।
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो भगवत्यर्पिताशयाः॥ ६९
राजकुमारो! तुमलोग विशुद्धभावसे स्वधर्मका आचरण करते हुए भगवान्में चित्त लगाकर मेरे कहे हुए इस स्तोत्रका जप करते रहो; भगवान् तुम्हारा मंगल करेंगे॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 532) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/69/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#415 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में
#1335 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): करेेंगे॥ → करेंगे॥