जब हम प्रजापतियोंको प्रजाका विस्तार करनेकी आज्ञा हुई, तब इसीके द्वारा हमने अपना अज्ञान निवृत्त करके अनेक प्रकारकी प्रजा उत्पन्न की थी॥ ७३॥✎ 4151335
ते वयं नोदिताः सर्वे प्रजासर्गे प्रजेश्वराः।
अनेन ध्वस्ततमसः सिसृक्ष्मो विविधाः प्रजाः॥ ७३
जब हम प्रजापतियोंको प्रजाका विस्तार करनेकी आज्ञा हुई, तब इसीके द्वारा हमने अपना अज्ञान निवृत्त करके अनेक प्रकारकी प्रजा उत्पन्न की थी॥ ७३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.73 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 532) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/73/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#415 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में
#1335 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): करेेंगे॥ → करेंगे॥