श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.73

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

ते वयं नोदिताः सर्वे प्रजासर्गे प्रजेश्‍वराः।

अनेन ध्वस्ततमसः सिसृक्ष्मो विविधाः प्रजाः॥ ७३

te vayaṃ noditāḥ sarve prajāsarge prajeśvarāḥ|

anena dhvastatamasaḥ sisṛkṣmo vividhāḥ prajāḥ|| 73

अर्थ

जब हम प्रजापतियोंको प्रजाका विस्तार करनेकी आज्ञा हुई, तब इसीके द्वारा हमने अपना अज्ञान निवृत्त करके अनेक प्रकारकी प्रजा उत्पन्‍न की थी॥ ७३॥✎ 415 1335

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #415 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #1335 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): करेेंगे॥ → करेंगे॥

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