श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

नानारण्यमृगव्रातैरनाबाधे मुनिव्रतैः।

आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितैः॥ १९

nānāraṇyamṛgavrātairanābādhe munivrataiḥ|

āhūtaṃ manyate pāntho yatra kokilakūjitaiḥ|| 19

अर्थ

वहाँके वन्य पशु भी मुनिजनोचित अहिंसादि व्रतोंका पालन करनेवाले थे, इसलिये उनसे किसीको कोई कष्ट नहीं पहुँचता था। वहाँ बार-बार जो कोकिलकी कुहू-ध्वनि होती थी, उससे मार्गमें चलनेवाले बटोहियोंको ऐसा भ्रम होता था मानो वह बगीचा विश्राम करनेके लिये उन्हें बुला रहा है॥ १९॥

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