उसका रंग साँवला था। कटिप्रदेश सुन्दर था। वह पीले रंगकी साड़ी और सोनेकी करधनी पहने हुए थी तथा चलते समय चरणोंसे नूपुरोंकी झनकार करती जाती थी। अधिक क्या, वह साक्षात् कोई देवी-सी जान पड़ती थी॥ २३॥
पिशंगनीवीं सुश्रोणीं श्यामां कनकमेखलाम्।
पद्भ्यां क्वणद्भ्यां चलतीं नूपुरैर्देवतामिव॥ २३
उसका रंग साँवला था। कटिप्रदेश सुन्दर था। वह पीले रंगकी साड़ी और सोनेकी करधनी पहने हुए थी तथा चलते समय चरणोंसे नूपुरोंकी झनकार करती जाती थी। अधिक क्या, वह साक्षात् कोई देवी-सी जान पड़ती थी॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 535) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/23/