क्षेम्यं१ वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद् गृहाश्रमः॥ ४०
pitṛdevarṣimartyānāṃ bhūtānāmātmanaśca ha|
kṣemyaṃ vadanti śaraṇaṃ bhave'smin yad gṛhāśramaḥ|| 40
अर्थ
महापुरुषोंका कथन है कि इस लोकमें पितर, देव, ऋषि, मनुष्य तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके और अपने भी कल्याणका आश्रय एकमात्र गृहस्थाश्रम ही है॥ ४०॥✎ 13361337
पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्च ह।
क्षेम्यं वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद् गृहाश्रमः॥ ४०
महापुरुषोंका कथन है कि इस लोकमें पितर, देव, ऋषि, मनुष्य तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके और अपने भी कल्याणका आश्रय एकमात्र गृहस्थाश्रम ही है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 537) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/40/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—क्षेमं।
(मुद्रित पृष्ठ 537)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें