न वृणीत प्रियं२ प्राप्तं मादृशी त्वादृशं पतिम्३॥ ४१
kā nāma vīra vikhyātaṃ vadānyaṃ priyadarśanam|
na vṛṇīta priyaṃ prāptaṃ mādṛśī tvādṛśaṃ patim|| 41
अर्थ
वीरशिरोमणे! लोकमें मेरी-जैसी कौन स्त्री होगी, जो स्वयं प्राप्त हुए आप-जैसे सुप्रसिद्ध, उदारचित्त और सुन्दर पतिको वरण न करेगी॥ ४१॥✎ 13361337
का नाम वीर विख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम्।
न वृणीत प्रियं प्राप्तं मादृशी त्वादृशं पतिम्॥ ४१
वीरशिरोमणे! लोकमें मेरी-जैसी कौन स्त्री होगी, जो स्वयं प्राप्त हुए आप-जैसे सुप्रसिद्ध, उदारचित्त और सुन्दर पतिको वरण न करेगी॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 537) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/41/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—पतिं।
(मुद्रित पृष्ठ 537)
३
प्रा० पा०—स्वयम्।
(मुद्रित पृष्ठ 537)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें