श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.42

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयोः

स्त्रिया न सज्जेद्भुजयोर्महाभुज।

योऽनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धत-

स्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम्॥ ४२

kasyā manaste bhuvi bhogibhogayoḥ

striyā na sajjedbhujayormahābhuja|

yo'nāthavargādhimalaṃ ghṛṇoddhata-

smitāvalokena caratyapohitum|| 42

अर्थ

महाबाहो! इस पृथ्वीपर आपकी साँप-जैसी गोलाकार सुकोमल भुजाओंमें स्थान पानेके लिये किस कामिनीका चित्त न ललचावेगा? आप तो अपनी मधुर मुसकानमयी करुणापूर्ण दृष्टिसे हम-जैसी अनाथाओंके मानसिक सन्तापको शान्त करनेके लिये ही पृथ्वीमें विचर रहे हैं’॥ ४२॥✎ 1336 1337

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें
  • #1337 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विषय-भोगों-की → विषय-भोगोंकी

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