श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

आसुरी नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरंजनः।

ग्रामकं नाम विषयं दुर्मदेन समन्वितः॥ ५२

āsurī nāma paścād dvāstayā yāti puraṃjanaḥ|

grāmakaṃ nāma viṣayaṃ durmadena samanvitaḥ|| 52

अर्थ

पश्चिम दिशामें आसुरी नामका दरवाजा था, उसमें होकर वह दुर्मदके साथ ग्रामक देशको जाता था॥ ५२॥✎ 1338 1339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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