श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

निर्ऋतिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरंजनः।✎ 1033 1034

वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वितः॥ ५३

nir:ṛtirnāma paścād dvāstayā yāti puraṃjanaḥ|

vaiśasaṃ nāma viṣayaṃ lubdhakena samanvitaḥ|| 53

अर्थ

तथा निर्ऋति नामका जो दूसरा पश्चिम द्वार था, उससे लुब्धकके साथ वह वैशस नामके देशको जाता था॥ ५३॥✎ 1338 1339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1033 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिर्नाम → निऋर्ऋतिर्नाम
  • #1034 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिर्नाम → निर्ऋतिर्नाम
  • #1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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