इस नगरके निवासियोंमें निर्वाक् और पेशस्कृत्—ये दो नागरिक अन्धे थे। राजा पुरंजन आँखवाले नागरिकोंका अधिपति होनेपर भी इन्हींकी सहायतासे जहाँ-तहाँ जाता और सब प्रकारके कार्य करता था॥ ५४॥
अन्धावमीषां पौराणां निर्वाक्पेशस्कृतावुभौ।
अक्षण्वतामधिपतिस्ताभ्यां याति करोति च॥ ५४
इस नगरके निवासियोंमें निर्वाक् और पेशस्कृत्—ये दो नागरिक अन्धे थे। राजा पुरंजन आँखवाले नागरिकोंका अधिपति होनेपर भी इन्हींकी सहायतासे जहाँ-तहाँ जाता और सब प्रकारके कार्य करता था॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 539) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/25/54/