(इस प्रकार) राजा पुरंजन अपनी सुन्दरी रानीके द्वारा ठगा गया। सारा प्रकृतिवर्ग—परिकर ही उसको धोखा देने लगा। वह मूर्ख विवश होकर इच्छा न होनेपर भी खेलके लिये घरपर पाले हुए बंदरके समान अनुकरण करता रहता॥ ६२॥
विप्रलब्धो महिष्यैवं सर्वप्रकृतिवंचितः।
नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञः क्लैब्यात्क्रीडामृगो यथा॥ ६२
(इस प्रकार) राजा पुरंजन अपनी सुन्दरी रानीके द्वारा ठगा गया। सारा प्रकृतिवर्ग—परिकर ही उसको धोखा देने लगा। वह मूर्ख विवश होकर इच्छा न होनेपर भी खेलके लिये घरपर पाले हुए बंदरके समान अनुकरण करता रहता॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 539) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/25/62/