॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.26.1
अथ षड्विंशोऽध्यायः
राजा पुरंजनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना
नारद उवाच
स एकदा महेष्वासो रथं पञ्चाश्वमाशुगम्।
द्वीषं द्विचक्रमेकाक्षं त्रिवेणुं पञ्चबन्धुरम्॥ १
sa ekadā maheṣvāso rathaṃ pañcāśvamāśugam|
dvīṣaṃ dvicakramekākṣaṃ triveṇuṃ pañcabandhuram|| 1
अर्थ
श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! एक दिन राजा पुरंजन अपना विशाल धनुष, सोनेका कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापतिके साथ पाँच घोड़ोंके शीघ्रगामी रथमें बैठकर पंचप्रस्थ नामके वनमें गया। उस रथमें दो ईषादण्ड (बंब), दो पहिये, एक धुरी, तीन ध्वजदण्ड, पाँच डोरियाँ, एक लगाम, एक सारथि, एक बैठनेका स्थान, दो जुए, पाँच आयुध और सात आवरण थे। वह पाँच प्रकारकी चालोंसे चलता था तथा उसका साज-बाज सब सुनहरा था॥ १-३॥✎ 418