वह मनानेमें भी बहुत कुशल था, इसलिये अब पुरंजनने उसे धीरे-धीरे मनाना आरम्भ किया। उसने पहले उसके चरण छूए और फिर गोदमें बिठाकर बड़े प्यारसे कहने लगा॥ २०॥
अनुनिन्येऽथ शनकैर्वीरोऽनुनयकोविदः।
पस्पर्श पादयुगलमाह चोत्संगलालिताम्॥ २०
वह मनानेमें भी बहुत कुशल था, इसलिये अब पुरंजनने उसे धीरे-धीरे मनाना आरम्भ किया। उसने पहले उसके चरण छूए और फिर गोदमें बिठाकर बड़े प्यारसे कहने लगा॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 542) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/26/20/