पुरंजन बोला—सुन्दरि! वे सेवक तो निश्चय ही बड़े अभागे हैं, जिनके अपराध करनेपर स्वामी उन्हें अपना समझकर शिक्षाके लिये उचित दण्ड नहीं देते॥ २१॥
नूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वीश्वराःशुभे।
कृतागस्स्वात्मसात्कृत्वा शिक्षादण्डं न युंजते॥ २१
पुरंजन बोला—सुन्दरि! वे सेवक तो निश्चय ही बड़े अभागे हैं, जिनके अपराध करनेपर स्वामी उन्हें अपना समझकर शिक्षाके लिये उचित दण्ड नहीं देते॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 542) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/26/21/