पुरंजनके तरह-तरहके पंखोंवाले बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर अनेकों जीव बड़े कष्टके साथ प्राण त्यागने लगे। उसका वह निर्दयतापूर्ण जीव-संहार देखकर सभी दयालु पुरुष बहुत दुःखी हुए। वे इसे सह नहीं सके॥ ९॥
तत्र निर्भिन्नगात्राणां चित्रवाजैः शिलीमुखैः।
विप्लवोऽभूद्दुःखितानां दुःसहः करुणात्मनाम्॥ ९
पुरंजनके तरह-तरहके पंखोंवाले बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर अनेकों जीव बड़े कष्टके साथ प्राण त्यागने लगे। उसका वह निर्दयतापूर्ण जीव-संहार देखकर सभी दयालु पुरुष बहुत दुःखी हुए। वे इसे सह नहीं सके॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 540) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/26/9/