श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तत्र निर्भिन्‍नगात्राणां चित्रवाजैः शिलीमुखैः।

विप्लवोऽभूद्दुःखितानां दुःसहः करुणात्मनाम्॥ ९

tatra nirbhinnagātrāṇāṃ citravājaiḥ śilīmukhaiḥ|

viplavo'bhūdduḥkhitānāṃ duḥsahaḥ karuṇātmanām|| 9

अर्थ

पुरंजनके तरह-तरहके पंखोंवाले बाणोंसे छिन्‍न-भिन्‍न होकर अनेकों जीव बड़े कष्टके साथ प्राण त्यागने लगे। उसका वह निर्दयतापूर्ण जीव-संहार देखकर सभी दयालु पुरुष बहुत दुःखी हुए। वे इसे सह नहीं सके॥ ९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें