श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

गन्धर्वयवनाक्रान्तां कालकन्योपमर्दिताम्।

हातुं प्रचक्रमे राजा१ तां पुरीमनिकामतः॥ १०

gandharvayavanākrāntāṃ kālakanyopamarditām|

hātuṃ pracakrame rājā tāṃ purīmanikāmataḥ|| 10

अर्थ

ऐसी अवस्थामें उनसे बिछुड़नेकी इच्छा न होनेपर भी उसे उस पुरीको छोड़नेके लिये बाध्य होना पड़ा; क्योंकि उसे गन्धर्व और यवनोंने घेर रखा था तथा कालकन्याने कुचल दिया था॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—राजन् तां पुरीमभिनिकामतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 547)

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