॥ श्रीहरिः ॥
अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृतिः समाः।
शाश्वतीरनुभूयार्तिं प्रमदासंगदूषितः॥ २७
anantapāre tamasi magno naṣṭasmṛtiḥ samāḥ|
śāśvatīranubhūyārtiṃ pramadāsaṃgadūṣitaḥ|| 27
अर्थ
वह वर्षोंतक विवेकहीन अवस्थामें अपार अन्धकारमें पड़ा निरन्तर कष्ट भोगता रहा। स्त्रीकी आसक्तिसे उसकी यह दुर्गति हुई थी॥ २७॥
अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृतिः समाः।
शाश्वतीरनुभूयार्तिं प्रमदासंगदूषितः॥ २७
वह वर्षोंतक विवेकहीन अवस्थामें अपार अन्धकारमें पड़ा निरन्तर कष्ट भोगता रहा। स्त्रीकी आसक्तिसे उसकी यह दुर्गति हुई थी॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/27/