॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.28.36
कन्दाष्टिभिर्मूलफलैः पुष्पपर्णैस्तृणोदकैः।
वर्तमानः शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थितः॥ ३६
kandāṣṭibhirmūlaphalaiḥ puṣpaparṇaistṛṇodakaiḥ|
vartamānaḥ śanairgātrakarśanaṃ tapa āsthitaḥ|| 36
अर्थ
वहाँ रहकर उन्होंने कन्द, बीज, मूल, फल, पुष्प, पत्ते, तृण और जलसे ही निर्वाह करते हुए बड़ा कठोर तप किया। इससे धीरे-धीरे उनका शरीर बहुत सूख गया॥ ३६॥