श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कन्दाष्टिभिर्मूलफलैः पुष्पपर्णैस्तृणोदकैः।

वर्तमानः शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थितः॥ ३६

kandāṣṭibhirmūlaphalaiḥ puṣpaparṇaistṛṇodakaiḥ|

vartamānaḥ śanairgātrakarśanaṃ tapa āsthitaḥ|| 36

अर्थ

वहाँ रहकर उन्होंने कन्द, बीज, मूल, फल, पुष्प, पत्ते, तृण और जलसे ही निर्वाह करते हुए बड़ा कठोर तप किया। इससे धीरे-धीरे उनका शरीर बहुत सूख गया॥ ३६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें