॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.28.37
शीतोष्णवातवर्षाणि क्षुत्पिपासे प्रियाप्रिये।
सुखदुःखे इति द्वन्द्वान्यजयत्समदर्शनः॥ ३७
śītoṣṇavātavarṣāṇi kṣutpipāse priyāpriye|
sukhaduḥkhe iti dvandvānyajayatsamadarśanaḥ|| 37
अर्थ
महाराज मलयध्वजने सर्वत्र समदृष्टि रखकर शीत-उष्ण, वर्षा-वायु, भूख-प्यास, प्रिय-अप्रिय और सुख-दुःखादि सभी द्वन्द्वोंको जीत लिया॥ ३७॥