श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

साक्षाद्भगवतोक्तेन गुरुणा हरिणा नृप।

विशुद्धज्ञानदीपेन स्फुरता विश्‍वतोमुखम्॥ ४१

sākṣādbhagavatoktena guruṇā hariṇā nṛpa|

viśuddhajñānadīpena sphuratā viśvatomukham|| 41

अर्थ

राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरिके उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरणमें सब ओर स्फुरित होनेवाले विशुद्ध विज्ञानदीपकसे उन्होंने देखा कि अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्थाकी भाँति देहादि समस्त उपाधियोंमें व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है। ऐसा अनुभव करके वे सब ओरसे उदासीन हो गये॥ ४०-४१॥✎ 1341

यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1341 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विज्ञान-दीपकसे → विज्ञानदीपकसे

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