फिर अपनी आत्माको परब्रह्ममें और परब्रह्मको आत्मामें अभिन्नरूपसे देखा और अन्तमें इस अभेद चिन्तनको भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गये॥ ४२॥✎ 1341
परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथाऽऽत्मनि।
वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम ह॥ ४२
फिर अपनी आत्माको परब्रह्ममें और परब्रह्मको आत्मामें अभिन्नरूपसे देखा और अन्तमें इस अभेद चिन्तनको भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गये॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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