॥ श्रीहरिः ॥
पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम्।
प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता॥ ४३
patiṃ paramadharmajñaṃ vaidarbhī malayadhvajam|
premṇā paryacaraddhitvā bhogān sā patidevatā|| 43
अर्थ
राजन्! इस समय पतिपरायणा वैदर्भी सब प्रकारके भोगोंको त्यागकर अपने परमधर्मज्ञ पति मलयध्वजकी सेवा बड़े प्रेमसे करती थी॥ ४३॥
पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम्।
प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता॥ ४३
राजन्! इस समय पतिपरायणा वैदर्भी सब प्रकारके भोगोंको त्यागकर अपने परमधर्मज्ञ पति मलयध्वजकी सेवा बड़े प्रेमसे करती थी॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/43/