श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा।

बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम्॥ ४४

cīravāsā vratakṣāmā veṇībhūtaśiroruhā|

babhāvupa patiṃ śāntā śikhā śāntamivānalam|| 44

अर्थ

वह चीर-वस्त्र धारण किये रहती, व्रत उपवासादिके कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिरके बाल आपसमें उलझ जानेके कारण उनमें लटें पड़ गयी थीं। उस समय अपने पतिदेवके पास वह अंगारभावको प्राप्त धूमरहित अग्‍निके समीप अग्‍निकी शान्त शिखाके समान सुशोभित हो रही थी॥ ४४॥

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