राजन्! इसी समय उसका कोई पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबलाको मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा॥ ५१॥
तत्र पूर्वतरः कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान्।
सान्त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो॥ ५१
राजन्! इसी समय उसका कोई पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबलाको मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 551) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/28/51/