श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तत्र पूर्वतरः कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान्।

सान्त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो॥ ५१

tatra pūrvataraḥ kaścitsakhā brāhmaṇa ātmavān|

sāntvayan valgunā sāmnā tāmāha rudatīṃ prabho|| 51

अर्थ

राजन्! इसी समय उसका कोई पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबलाको मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा॥ ५१॥

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