श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

ब्राह्मण उवाच

का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि।

जानासि२ किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ३ ह॥ ५२

kā tvaṃ kasyāsi ko vāyaṃ śayāno yasya śocasi|

jānāsi kiṃ sakhāyaṃ māṃ yenāgre vicacartha ha|| 52

अर्थ

ब्राह्मणने कहा—तू कौन है? किसकी पुत्री है? और जिसके लिये तू शोक कर रही है, वह यह सोया हुआ पुरुष कौन है? क्या तुम मुझे नहीं जानती? मैं वही तेरा मित्र हूँ, जिसके साथ तू पहले विचरा करती थी॥ ५२॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—किं जानासि।

    (मुद्रित पृष्ठ 551)
  2. ३

    प्रा० पा०—विचरेम हि।

    (मुद्रित पृष्ठ 551)

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