सखे! क्या तुम्हें अपनी याद आती है, किसी समय मैं तुम्हारा अविज्ञात नामका सखा था? तुम पृथ्वीके भोग भोगनेके लिये निवास-स्थानकी खोजमें मुझे छोड़कर चले गये थे॥ ५३॥
अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे।
हित्वा मां पदमन्विच्छन् भौमभोगरतो गतः॥ ५३
सखे! क्या तुम्हें अपनी याद आती है, किसी समय मैं तुम्हारा अविज्ञात नामका सखा था? तुम पृथ्वीके भोग भोगनेके लिये निवास-स्थानकी खोजमें मुझे छोड़कर चले गये थे॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 551) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/28/53/