आर्य! पहले मैं और तुम एक-दूसरेके मित्र एवं मानसनिवासी हंस थे। हम दोनों सहस्रों वर्षोंतक बिना किसी निवास-स्थानके ही रहे थे॥ ५४॥
हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ।
अभूतामन्तरा वौकः सहस्रपरिवत्सरान्॥ ५४
आर्य! पहले मैं और तुम एक-दूसरेके मित्र एवं मानसनिवासी हंस थे। हम दोनों सहस्रों वर्षोंतक बिना किसी निवास-स्थानके ही रहे थे॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 551) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/54/