॥ श्रीहरिः ॥
स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम्।
विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया॥ ५५
sa tvaṃ vihāya māṃ bandho gato grāmyamatirmahīm|
vicaran padamadrākṣīḥ kayācinnirmitaṃ striyā|| 55
अर्थ
किन्तु मित्र! तुम विषयभोगोंकी इच्छासे मुझे छोड़कर यहाँ पृथ्वीपर चले आये! यहाँ घूमते-घूमते तुमने एक स्त्रीका रचा हुआ स्थान देखा॥ ५५॥
स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम्।
विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया॥ ५५
किन्तु मित्र! तुम विषयभोगोंकी इच्छासे मुझे छोड़कर यहाँ पृथ्वीपर चले आये! यहाँ घूमते-घूमते तुमने एक स्त्रीका रचा हुआ स्थान देखा॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 551) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/55/