श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन्।

उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम्॥ ३१

tathā kāmāśayo jīva uccāvacapathā bhraman|

uparyadho vā madhye vā yāti diṣṭaṃ priyāpriyam|| 31

अर्थ

जिस प्रकार बेचारा भूखसे व्याकुल कुत्ता दर-दर भटकता हुआ अपने प्रारब्धानुसार कहीं डंडा खाता है और कहीं भात खाता है, उसी प्रकार यह जीव चित्तमें नाना प्रकारकी वासनाओंको लेकर ऊँचे-नीचे मार्गसे ऊपर, नीचे अथवा मध्यके लोकोंमें भटकता हुआ अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगता रहता है॥ ३०-३१॥✎ 1345 1346 1347

यह अर्थ श्लोक 30–31 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
  • #1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
  • #1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें

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