श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु।

जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया॥ ३२

duḥkheṣvekatareṇāpi daivabhūtātmahetuṣu|

jīvasya na vyavacchedaḥ syāccettattatpratikriyā|| 32

अर्थ

आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंमेंसे किसी भी एकसे जीवका सर्वथा छुटकारा नहीं हो सकता। यदि कभी वैसा जान पड़ता है तो वह केवल तात्कालिक निवृत्ति ही है॥ ३२॥

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