श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.48

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः।

आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः॥ ४८

svaṃ lokaṃ na viduste vai yatra devo janārdanaḥ|

āhurdhūmradhiyo vedaṃ sakarmakamatadvidaḥ|| 48

अर्थ

जो मलिनमति कर्मवादी लोग वेदको कर्मपरक बताते हैं, वे वास्तवमें उसका मर्म नहीं जानते। इसका कारण यही है कि वे अपने स्वरूपभूत लोक (आत्मतत्त्व)को नहीं जानते, जहाँ साक्षात् श्रीजनार्दन भगवान् विराजमान हैं॥ ४८॥✎ 420 1608

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #420 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #1608 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (आत्मतत्त्व)-को → (आत्मतत्त्व)को

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